मुंबई के डोंगरी इलाक़े में एक चार मंज़िला इमारत ढह गयी है. इसमें 40 से अधिक लोगों के दबे होने की आशंका है. स्थानीय अधिकारियों ने अभी तक दो लोगों की मौत की पुष्टि की है.
फायर ब्रिगेड की टीमें तुरंत मौके पर पहुंची हैं और राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया है.
घटनास्थल पर दमकल विभाग की टीमें राहत कार्य में लगी हैं. ये इलाक़ा घनी आबादी वाला है और यहां गलियां तंग हैं ऐसे में राहत दलों को दिक्कतें भी आ रही हैं.
दमकल विभाग के चीफ़ फ़ायर ऑफि़सर प्रभात रहांगदले ने बताया, "यह चार मंज़िला इमारत थी. राहत और बचाव कार्य अभी चल रहे हैं. लोग मलबे में दबे हुए हैं. जेसीबी और नगर निगम के मज़दूरों की मदद ली जा रही है. राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ़) को बुलाया गया है."
एक चश्मदीद के मुताबिक, "जो इमारत गिरी है वो अस्सी साल पुरानी होगी. इस इलाक़े की सभी इमारतें काफ़ी पुरानी हैं. तीस-चालीस लोग दबे हो सकते हैं. इमारत गिरने के बाद लोग इधर उधर भागने लगे."
जानकारी के मुताबिक इस इमारत में छह-सात परिवार रह रहे थे.
स्थानीय विधायक वारिस पठान ने समाचार चैनल एबीपी से कहा, "हम चार साल से सरकार से ख़तरनाक इमारतों के मुद्दे को सुलझाने के लिए कह रहे हैं लेकिन सरकार ने इस और ध्यान नहीं दिया है."
दो दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश के सोलन ज़िले में भारी बारिश के बीच रविवार को एक बहुमंज़िला इमारत गिर गई थी. उस हादसे में कई सैनिकों की मौत हो गई थी.
20 साल पहले कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी. इस लड़ाई की शुरुआत तब हुई थी जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की ऊँची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे. पेश है कारगिल युद्ध की बीसवीं बरसी पर विशेष शृंखला की पहली कड़ी.
8 मई, 1999. पाकिस्तान की 6 नॉरदर्न लाइट इंफ़ैंट्री के कैप्टेन इफ़्तेख़ार और लांस हवलदार अब्दुल हकीम 12 सैनिकों के साथ कारगिल की आज़म चौकी पर बैठे हुए थे. उन्होंने देखा कि कुछ भारतीय चरवाहे कुछ दूरी पर अपने मवेशियों को चरा रहे थे.
पाकिस्तानी सैनिकों ने आपस में सलाह की कि क्या इन चरवाहों को बंदी बना लिया जाए? किसी ने कहा कि अगर उन्हें बंदी बनाया जाता है, तो वो उनका राशन खा जाएंगे जो कि ख़ुद उनके लिए भी काफ़ी नहीं है. उन्हें वापस जाने दिया गया. क़रीब डेढ़ घंटे बाद ये चरवाहे भारतीय सेना के 6-7 जवानों के साथ वहाँ वापस लौटे.
भारतीय सैनिकों ने अपनी दूरबीनों से इलाक़े का मुआयना किया और वापस चले गए. क़रीब 2 बजे वहाँ एक लामा हेलिकॉप्टर उड़ता हुआ आया.
इतना नीचे कि कैप्टेन इफ़्तेख़ार को पायलट का बैज तक साफ़ दिखाई दे रहा था. ये पहला मौक़ा था जब भारतीय सैनिकों को भनक पड़ी कि बहुत सारे पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की पहाड़ियों की ऊँचाइयों पर क़ब्ज़ा जमा लिया है.
कारगिल पर मशहूर किताब 'विटनेस टू ब्लंडर- कारगिल स्टोरी अनफ़ोल्ड्स' लिखने वाले पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड कर्नल अशफ़ाक़ हुसैन ने बीबीसी को बताया, "मेरी ख़ुद कैप्टेन इफ़्तेख़ार से बात हुई है. उन्होंने मुझे बताया कि अगले दिन फिर भारतीय सेना के लामा हेलिकॉप्टर वहाँ पहुंचे और उन्होंने आज़म, तारिक़ और तशफ़ीन चौकियों पर जम कर गोलियाँ चलाईं. कैप्टेन इफ़्तेख़ार ने बटालियन मुख्यालय से भारतीय हेलिकॉप्टरों पर गोली चलाने की अनुमति माँगी लेकिन उन्हें ये इजाज़त नहीं दी गई, क्योंकि इससे भारतीयों के लिए 'सरप्राइज़ एलिमेंट' ख़त्म हो जाएगा."
फायर ब्रिगेड की टीमें तुरंत मौके पर पहुंची हैं और राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया है.
घटनास्थल पर दमकल विभाग की टीमें राहत कार्य में लगी हैं. ये इलाक़ा घनी आबादी वाला है और यहां गलियां तंग हैं ऐसे में राहत दलों को दिक्कतें भी आ रही हैं.
दमकल विभाग के चीफ़ फ़ायर ऑफि़सर प्रभात रहांगदले ने बताया, "यह चार मंज़िला इमारत थी. राहत और बचाव कार्य अभी चल रहे हैं. लोग मलबे में दबे हुए हैं. जेसीबी और नगर निगम के मज़दूरों की मदद ली जा रही है. राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ़) को बुलाया गया है."
एक चश्मदीद के मुताबिक, "जो इमारत गिरी है वो अस्सी साल पुरानी होगी. इस इलाक़े की सभी इमारतें काफ़ी पुरानी हैं. तीस-चालीस लोग दबे हो सकते हैं. इमारत गिरने के बाद लोग इधर उधर भागने लगे."
जानकारी के मुताबिक इस इमारत में छह-सात परिवार रह रहे थे.
स्थानीय विधायक वारिस पठान ने समाचार चैनल एबीपी से कहा, "हम चार साल से सरकार से ख़तरनाक इमारतों के मुद्दे को सुलझाने के लिए कह रहे हैं लेकिन सरकार ने इस और ध्यान नहीं दिया है."
दो दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश के सोलन ज़िले में भारी बारिश के बीच रविवार को एक बहुमंज़िला इमारत गिर गई थी. उस हादसे में कई सैनिकों की मौत हो गई थी.
20 साल पहले कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी. इस लड़ाई की शुरुआत तब हुई थी जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की ऊँची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे. पेश है कारगिल युद्ध की बीसवीं बरसी पर विशेष शृंखला की पहली कड़ी.
8 मई, 1999. पाकिस्तान की 6 नॉरदर्न लाइट इंफ़ैंट्री के कैप्टेन इफ़्तेख़ार और लांस हवलदार अब्दुल हकीम 12 सैनिकों के साथ कारगिल की आज़म चौकी पर बैठे हुए थे. उन्होंने देखा कि कुछ भारतीय चरवाहे कुछ दूरी पर अपने मवेशियों को चरा रहे थे.
पाकिस्तानी सैनिकों ने आपस में सलाह की कि क्या इन चरवाहों को बंदी बना लिया जाए? किसी ने कहा कि अगर उन्हें बंदी बनाया जाता है, तो वो उनका राशन खा जाएंगे जो कि ख़ुद उनके लिए भी काफ़ी नहीं है. उन्हें वापस जाने दिया गया. क़रीब डेढ़ घंटे बाद ये चरवाहे भारतीय सेना के 6-7 जवानों के साथ वहाँ वापस लौटे.
भारतीय सैनिकों ने अपनी दूरबीनों से इलाक़े का मुआयना किया और वापस चले गए. क़रीब 2 बजे वहाँ एक लामा हेलिकॉप्टर उड़ता हुआ आया.
इतना नीचे कि कैप्टेन इफ़्तेख़ार को पायलट का बैज तक साफ़ दिखाई दे रहा था. ये पहला मौक़ा था जब भारतीय सैनिकों को भनक पड़ी कि बहुत सारे पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की पहाड़ियों की ऊँचाइयों पर क़ब्ज़ा जमा लिया है.
कारगिल पर मशहूर किताब 'विटनेस टू ब्लंडर- कारगिल स्टोरी अनफ़ोल्ड्स' लिखने वाले पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड कर्नल अशफ़ाक़ हुसैन ने बीबीसी को बताया, "मेरी ख़ुद कैप्टेन इफ़्तेख़ार से बात हुई है. उन्होंने मुझे बताया कि अगले दिन फिर भारतीय सेना के लामा हेलिकॉप्टर वहाँ पहुंचे और उन्होंने आज़म, तारिक़ और तशफ़ीन चौकियों पर जम कर गोलियाँ चलाईं. कैप्टेन इफ़्तेख़ार ने बटालियन मुख्यालय से भारतीय हेलिकॉप्टरों पर गोली चलाने की अनुमति माँगी लेकिन उन्हें ये इजाज़त नहीं दी गई, क्योंकि इससे भारतीयों के लिए 'सरप्राइज़ एलिमेंट' ख़त्म हो जाएगा."
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