नई दिल्ली. समय बचाने के लिए क्या अयोध्या विवाद को मध्यस्थ के पास भेजा जा सकता है, इस पर सुप्रीम कोर्ट 5 मार्च को फैसला करेगा। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में मध्यस्थ के जरिए विवाद का समाधान निकालने पर सहमति जताई। कोर्ट का कहना है कि एक फीसदी चांस होने पर भी मध्यस्थ के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए। इससे पहले चीफ जस्टिस ने अयोध्या मामले से जुड़े दस्तावेजों की अनुवाद रिपोर्ट पर सभी पक्षों से राय मांगी। एक पक्ष की तरफ से पेश वकील राजीव धवन का कहना था कि अनुवाद की कापियों को जांचने के लिए उन्हें 8 से 12 हफ्ते का समय चाहिए। रामलला की तरफ से पेश एस वैद्यनाथन ने कहा कि दिसंबर 2017 में सभी पक्षों ने दस्तावेजों के अनुवाद की रिपोर्ट को जांचने के बाद स्वीकार किया था। दो साल बाद ये लोग सवाल क्यों उठा रहे हैं? 14 अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर हो रही है। अदालत ने सुनवाई में केंद्र की उस याचिका को भी शामिल किया है, जिसमें सरकार ने गैर विवादित जमीन को उनके मालिक...